एक गुल्लक रख रखी है मैंने
अपने सिरहाने
बड़ी सी...
रोज रात को सोने से पहले
भर देती हूं उसमें
दिन भर का विषाद
किसी के ताने, किसी के उलाहने
किसी के लिए जलन
और किसी के प्रति गुस्सा
सब ही समाहित हो जाते हैं
उस गुल्लक में
और यूं रीती हो जाती हूं मैं
खो जाती हूं , सुंदर सपनों में
जब भी दिल भारी होता है
उडे़ल कर सब बोझ
उस गुल्लक में
हल्की हो जाती हूं मैं
चाबी खो दी है उसकी मैंने
तोड़ने उसे नहीं कभी वाली हूँ मैं
एक और गुल्लक भी है मेरे पास
उसमें जमा करती हूं मैं दुआएं
रोज सुबह उसमें से कुछ दुआएं
निकालती हूं..
दिन भर खर्चती हूं
फिर डरती हूं कि कहीं गुल्लक
रीत न जाए।
भरती हूं दिन प्रतिदिन उसे
लोगों की दुआओं से
कि आड़े वक्त यही तो काम आएंगी।
आओ कुछ दुआएँ इकट्ठी करते हैं।🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻