मोरपंख के साथ ....तुम्हारी
बांसुरी भी संभाल रखी है कान्हा...
अब ये 'राधे' नहीं "कान्हा"की ही जाप करती हैं,
और ये मोरपंख....ये मोरपंख तो आज भी अपने सिरहाने ही रखती हूँ मैं...
तुम्हारे ना होकर भी होने का अहसास
दिलाता है ये...मुझे...
मगर ये बांसुरी...ये बांसुरी
तो जैसे धुन ही खोने लगें है...धीरे-धीरे भटकने लगें हैं साज़ इसके...या शायद टूट रहा है इसके मन का तार कोई...!
ए- हुस्न - की - राजकुमारी❣