ये बात उन दिनों की हैं ,
जब कुछ भी नया देखती या कुछ भी नया सुनती ,
तो कुछ कर जाने की उम्मीद दिल में जाग जाती ।
गिरने के डर से ज्यादा ,
कुछ करने का हौसला खुद में था ।
पता था ,, एक दिन
ज़िंदगी में कुछ ऐसा कर जाना है ,,
मिसाल देना ही नहीं ,,
मिसाल बन जाना है ।
विश्वास खुद पर किया
और जो कहते थे ,,
तुमसे नहीं होगा ,,
उन्हें दरकिनार किया ।
कैसे नहीं होगा ,
क्यूं नहीं होगा ,,
ये डर को कभी पास भटकने ही नहीं दिया ।
खुद से जीतने की ज़िद्द थी
दुनिया को हराना था ।
पता था एक दिन वो भी आयेगा
जो कहते हैं तुमसे नहीं होगा
वो कहेंगे तुमसे ही होगा ।
इसी उधेड़बुन में क्यूं याद ना रहा ,,
समझौता तेरा दीवाना था ।
वो समझौता जो हमेशा
तुझे अपनाना था ।
ख्वाब जो मिट्टी के घर जैसे ढ़ह गए ,,
सपने जो बिखरे से रह गए ।
कहते थे सही वो लोग ..
समझौता ही है अब और ।
" ज़िंदगी है समझौता
समझौता है ज़िंदगी "
फिर एक समझौता
फिर एक समझौता
फिर एक समझौता ।