अपने लिये जिये तो क्या जिये
खुदगर्ज़ दुनिया में ये इन्सान की पहचान है
जो पराई आग में जल जाए वो इन्सान है
अपने लिये जिये तो क्या जिये
तू जी ऐ दिल ज़माने के लिये
नाकामियों से घबराके क्यों अपनी आस खोते हो
मैं हमसफर तुम्हारा हूँ क्यों तुम उदास होते हो
हँसते रहो हँसाने के लिये
अपनी खुदी को जो समझा
उसने खुदा को पहचाना
आज़ाद फ़ितरत-ए-इन्सां
अंदाज़ क्यों गुलामाना
सर ये नहीं झुकाने के लिये
बाज़ार से ज़माने के कुछ भी ना हम खरीदेंगे
हाँ बेचकर ख़ुशी अपनी औरों के ग़म खरीदेंगे
बुझते दीये जलाने के लिए
हिम्मत बुलंद है अपनी
पत्थर सी जान रखते हैं
कदमों तले ज़मीं तो क्या
हम आसमान रखते हैं
गिरते हुओं को उठाने के लिये
चल आफ़ताब लेकर चल
चल महताब लेकर चल
तू अपनी एक ठोकर में
सौ इन्क़लाब लेकर चल
ज़ुल्म-ओ-सितम मिटाने के लिये
#SanjeevKumar