अधूरी सी जो रह गयी हैं चाहत मेरी।
सोचता हूँ कि काश !
पूरी हो जाती इस जनम में।
कुछ लम्हे कुछ पल
गुजारते उसके साथ भी
कितनी सारी बाते करते
कितनी सारी शिकायतें
हवा में उड़ जाती ......
अजीब सी बेचैनी है
फ़िज़ा का रंग बेचैन सा है
लगता है
आज फिर कोई उदास है
अगहन की इस आजमाइश में
कोहरे की इस अंधेरे में
दिल के गुबार धुंए से
उड़ते नज़र आ रहे हैं।...
कुछ तुम भी कहो न
या यूं ही चुप सी रहोगी
.......