क्यों हुआ ?
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शब्दों से गीत सँजोए थे ,फिर उनके हार पिरोए थे
उनको बाँधा हर आँचल में ,फिर रिश्ते सारे खोए थे
ये क्या संभव है ? पूछे मन, झुठलाए कैसे प्रश्न विकट
जब पूरा विश्व अचंभित है ,आँखों के सपने गए सिमट
मर्यादा के बँधन टूटे ,चटकी चूड़ी और बाली है
ये दशा क़यामत की आई, लगती बिरहन की गाली है
अपनी मर्यादा के बँधन ,टुकड़े-टुकड़े कैसे बिखरे
जानी-अनजानी राहों पर सपने क्योंकर सिसके ,ठिठके
पहचान नहीं हमको अपनी ,झूठी ही माला क्यों जपनी
जब बाँधे हैं बँधन तुमने ,फिर बंधन क्यों स्वीकार नहीं ?
Dr.Pranava Bharti