हास्य व्यंग हंसी के फव्वारे छोड़ते "श्री अलबेला जी" के कुछ दोहे...!
ये विचित्र भगवत गति सीख लीजिए मान ,
बुड्ढा यूं ही बैठा रहे ऊपर उठे जवान.........1
सज-धज कर गोरी चली लेकर हरि का नाम ,
आशा की थी राम की मिल गए आसाराम......2
कर्म उजागर हो रहे बाबा है भयभीत,
हनी प्रीतमें तड़प रहे गुरुवर हनप्रीत....3
लेखक :- श्री अलबेला जी