हमारे अगल-बगल
जो लोग चलते हैं,
जो स्नेह घूमते हैं,
जो फूल खिलते हैं,
जो पहाड़ कहते हैं,
जो नदियाँ सोचती हैं,
जो मन्दिर पूजते हैं,
जो राहें खोजती हैं,
जो जंगल पूछते हैं,
जो खेत उगाते हैं,
जो वसंत आते हैं,
जो सत्य होते हैं,
वे हमें ऊँचा उठाते हैं ।
* महेश रौतेला