" प्यासी बरखा "
तेरी मुस्कान बिखरती जाए मेरी आंखों में,
और यह मुस्कान उठाई कैसे जाएं
बिना बरसे हर रोज प्यासी बरखा,
मुझे साथ लेकर तुझ में सभाएं,
कौन किसे दो में से एक को समझाए...!
ख्वाबों से मैंने कहा हर रोज किस लिए आते हो..?
रात भर परेशान होकर किस लिए जी रहे हो...?
खुली पलकों को परेशान कर वापस क्यों जा रहे हो..?
क्युं दिल की धड़कन घर तक साथ लेकर आती हो..?
कौन किसे दो में से एक को समझाए...!
सेंथी का सिंदूर बन जाएगा अगर,
गुलाब जो एक बार कह दे कि तू है, पहचान
बिना की पक्की पहचान रंग उड़ जाए तो उड़ने दे,
लब मुरझा के परेशान हो गए मुझे तेरी ओर से तड़प आए,
कौन किसे दो में से एक को समझाएं...!
✍️ मनिष कुमार "मित्र" 🙏