Courtesy ~ Pannalal Roy ji.🙏
“कमाल-ए-इश्क़ में सोज़-ए-निहाँ बाक़ी नहीं रहता(सोज़-ए-निहाँ-inner sorrow)
भड़क जाते हैं जब शो'ले धुआँ बाक़ी नहीं रहता
जबीं तो फिर जबीं है आस्ताँ बाक़ी नहीं रहता(जबीं-forehead)
जहाँ तुम हो किसी का भी निशाँ बाक़ी नहीं रहता
तुम्हें देखूँ तो क्या देखूँ तुम्हें समझूँ को क्या समझूँ
मोहब्बत में तो अपना भी गुमाँ बाक़ी नहीं रहता
उन्हीं से पूछिए ये उन के दिल पर क्या गुज़रती है
बहारों में भी जिन का आशियाँ बाक़ी नहीं रहता
कभी याद उन की आई है कभी वो ख़ुद भी आते हैं
मोहब्बत में हिजाब-ए-दरमियाँ बाक़ी नहीं रहता ( हिजाब-ए-दरमियाँ-curtain between)
मोहब्बत रास आती है तो छा जाती है दुनिया पर
बिगड़ती है तो फिर नाम-ओ-निशाँ बाक़ी नहीं रहता
ख़िज़ाँ में लाला -ओ-गुल का भरम भी खुल ही जाता है (लाला-ओ-गुल-tulip and flowers)
हमेशा तो फ़रेब- ए- गुलिस्ताँ बाक़ी नहीं रहता (फ़रेब- ए- गुलिस्ताँ-deception, allurement of rosarium, garden
उसी मंज़िल में आते हैं कहीं दैर-ओ-हरम कभी(दैर-ओ-हरम -temple and mosque)
हरीम-ए-दिल से बच कर आस्ताँ बाक़ी नहीं रहता”(हरीम-ए-दिल -boundary of heart)
Courtesy ~ Pannalal Roy ji.