ये कैसी उलझन इश्क़ में दरखास्त दे बैठी है,
हादसा ए इश्क़ में गुम हो कर कर्ज कर्ज लिए बैठी है।
उसके लम्हों के गुमसुम बने वक्त की फितरत को,
खुदा से माँग लूँ नियति की लिखावट में खुशनुमा पल को।
और ये माँग ले जो भी जिंदगी के पल दो पल हसी के,
तो गम ए बरसात से लड़ जाऊ काट के सुनामी की हर लहर को।
DEAR ZINDAGI 💞