आज अचानक कानो में मेरे, पापा की आवाज़ पड़ी,
बेटी तो अब बड़ी हुई, कुछ ही समय में उसे विदा करें ।
बात सुनके दिल मे मेरे ख़यालो की बारिश हुई,
और पलकें भी गीली हुई ।
बड़ा ही अजीब अहेसास हुआ,
खुशी के साथ गम भी हुआ ।
गम था कि जिस आँगन में पली बड़ी,
अब उसी घर और लोगो से पल भर में मैं परायी हुई ?
पर ये सोच कर दिल को थोड़ा सुकून मिला,
की कोई तो होगा जो सिर्फ मेरा होगा ।
यही सोच कर में भी थोड़ा ख़यालो में उसके खोने लगी,
औए सपने नए बुनने लगी ।
फिर पापा ने जांच-परख कर तुम्हे चुना,
और मेरे लिए सपना बुना ।
मेरे लिए फिर भी तुम थे काफी अंजान,
पर पापा के भरोसे मेने अपना ही लिया उनका अरमान ।
एक नया रिश्ता जुड़ा,
एक नए रिश्ते के साथ दूसरे कई रिश्ता बुना ।
मन मेरा फिर घबराया,
पर अपनो की खुशी देखकर दिल को फिर बहेलाया ।
फिर देर देर तक बातों की शरुआत हुई,
सपनों और ख़यालो का लेनदेन हुआ ।
कई रातें यूँ सोचके गुज़ारी,
क्या तुम बिल्कुल वैसे हो जैसा मैंने सोचा था ?
धीरे धीरे तुम्हे जानने लगी, दिलसे अपना मानने लगी ।
नैनो से नैना मिलने लगे, मन के धागे जुड़ने लगे ।
और आखिर, दिल को तुमसे प्यार हो ही गया ।
प्यार हुआ तो ये जाना, की तुम वैसे नही जैसा मैंने सोचा था ।
तुम तो उससे कई बढ़कर हो ।
जो दिल को मेरे छू जाए वैसी प्यारी बातें करते हो,
मुजे खुश रखने की कोशिशें हज़ार करते हो ।
अब दिल तुमसे जुड़ने को बेताब है,
सात फेरों के बंधन में बंधने को तैयार है ।
रिश्ते और घर माना नए होंगे,
पर तुम राहबर हो तो डर हमे कैसे रहेगा ।
~ रुचिता गाबाणी