कभी कभी मिलने आ जाया करो,
जिंदगी बोरियत सी लगने लगी है।
एक अरसा हुआ खुद में जीते हुए।
अब तन्हाई में रातें सुलगने लगीं हैं।
काश ! कि तुम आ कर साथ बैठते।
सर्दी में तुम्हारी यादें महकने लगी हैं।
दिसम्बर का कोहरा घना है तो क्या।
तुम्हारी तस्वीर साफ दिखने लगी है।
उम्मीद में बैठा हूँ ,तुम आओगे जरूर।
बेचैन हूँ औऱ साँसे तेज़ चलने लगी हैं।
अर्जुन इलाहाबादी।