आज कल जिंदगी कैसे कैसे रंग दिखा रही है !! कभी लगता है जोर से चिल्ला कर अपने होने का एहसास करू, तो कभी लगता है खामोशी की गिरफ्त में कहीं खो जाऊँ. मन करता है कभी फूलों की खुशबु से खुद को महकाऊँ, तो कभी औंस की बूँदों की तरह यूँही पिघल जाऊँ. कभी कभी झिलमिलाते तारों में खुद के वज़ूद को तलाशु, तो कभी यूँही बादलों के पार कहीं गुम हो जाऊँ.कभी अपनों के साथ भी लफ्जों से समझोता करने का मन करता है, तो कभी चाहती हूं कोई अजनबी से ढेर सारी यूँही बेतुकी, बेमतलब सी बातें करूँ. सच में जिंदगी कैसे कैसे रंग दिखा रही है...