वाह रे जिंदगी मेरी नियति का दोष मुज पर सारे आम छलका दिया,
मेरी पूरी लिखावट के दौर में एक एक कतरा आंसू भी कहीं छुपा दिया।
उसके लिहाज ए महबूब बन महसूस किया हर मर्तबा,
और वो महोब्बत को हर करतब से जोड़ गया।
अपने हिस्से की खुशी भी उसकी जोली में डाल कर,
कुछ ऐसे खुद के चहेरे पर खुशियां का पेहरा लगा दिया।
अल्फ़ाज़ आज तक ना समझे मेरे किरदार ए महोब्बत का,
ए खुदा तेरे दरबार तक दिल की इल्तिज़ा ले गया।
में जीने से थक सा गया हूँ नये जख्मों से टूट कर,
जब वो मुझे एक ही दिन में लफ़्ज-ए-बुराइयाँ गिनवा गया।
DEAR ZINDAGI 😔