भाव बड़े विचित्र
खींचत मन में चित्र
अग्निशिखा के संग चिता में
देह से जलते जाते
फिर मन आँगन द्वार सुमन ले
निर्मल जल से आते
कभी सुमेरु दृढ़ पर्वत से
अनुपम बहुत कठोर
कभी मलय पवन के झोंके
करते भाव-विभोर
रश्मिरथी के स्यंदन हय से
सविचल सचल सचित्र
भाव बड़े विचित्र ..