अब इसी आस में जीना होगा
रात के बाद सवेरा होगा!
गुल कहीं और कहीं काँटा होगा
राह कैसी भी हो चलना होगा!
सर झुकाने से फ़क़त क्या होगा?
बेग़रज़ जो हो वो सजदा होगा!
इतना मुश्किल भी नहीं वस्ल ए खुदा
अपनी हस्ती को भुलाना होगा!
कल की सोचो तो भली ही सोचो
सोच अच्छी है तो अच्छा होगा!
धीरज आमेटा ‘धीर’