मुझे,अपना, पुराना-सा "बचपन-वाला घर" बहुत याद आता है.जहाँ आंगन की धूप, लुका-छिपी खेलती,हवा अपना दुपट्टा हिलाकर, कोना-कोना महकाती.जहाँ फर्श पर,मिटटी का बिछौना,गर्माहट दे जाता था.वो बेज़ुबान-दीवारें, लोरी गा-कर सुनाती.खुली खिड़कियां,आईना बन जाती और छत्त की मुंडेर मधुर-गीत गाती.वो नीम के पेड़ का बाँहों में भरना और आम के पेड़ों पर मंजरियों-संग खेलना.वो चाँद का झूमर की तरह चमकना और बादलों-संग अठखेलियां करना.वो छत पर तारों को गिनना.वो सहेलियों संग,गुड्डे-गुड़िया की शादी कराना.वो रूठना-मनाना, वो नखरा-दिखाना, फिर चुपके-से मान जाना.वो माँ के हाथों से खाना-खिलाना,वो मर्तबान का टूटना,वो आचार चुराना,वो सबकी नज़र से लड्डू छिपाना....
बहुत याद आता है; वो"बचपन-वाला घर"....
मंजरी शर्मा