तुम क्या समझ पाओगे मुजे,
मेरे प्यार को,
मेरी हसी में दबे गम को,
मीठी आवाज में छुपे कड़वे गम को,
में अक्सर बैठा यही सोचता हूं,
क्या तुम समज पाओगे??
मेरा गुस्सा
मेरा प्यार है,
मेरा रूठना
मेरा प्यार है,
जब आवाज़ ऊंची कर देता हूं तुम पर ,
तब तुमसे ज्यादा में खुद पर नाराज़ हो जाता हूं,
जब तुम कभी वक्त नही देते मुजे,
तब में खुद में कमिया खोज ने लगता हूँ,
जब कभी तुम व्यस्त होते हो,
खुद में,
अपने काम मे,
ना जाने क्यो मेरा मन होता है तुमसे खेलने का,
जैसे एक बच्चा खेलता है,
अपनो के साथ,
जब कभी तुम बरस पड़ते हो मुझ पर,
बे वजह,
युही,
जब में समझने की कोशिश करता हु तुम्हारी परेशानी,
तुम्हारी जलजलाहट,
जब कभी में तुमसे मिलने की जिद करता हु,
तब जी चाहता है कि सिर्फ तुम ओर सिर्फ तुम मेरे पास हो,
ये दुनिया बस ठहेर जाए,
पर अक्सर तुम मुझसे ही परेशान हो जाते हो,
तुम मेरे प्रेम से उकसा जाते हों,
तब में खुद से पूछता हूं,
क्या तुम समज सके कभी मेरा प्रेम ???
इसका जवाब ना आज तक मे खोज पाया,
ना अनुमान लगा सका,
इस लिए आज तुम्ही से पूछ लेना सही लगता है,
क्या तुम समज पाओगे,
मुजे,
मेरे प्रेम को???
✍आबाद खान