सिर्फ़ ........अपने हैं
मेरे ज़हन में क़ैद
कुछ ख़्वाब यूँ बंदी हैं
कि किसी भी सूरत
रिहा किये नहीं जाते।
कुछ अल्फ़ाज़ .....नहीं उतरते
पन्नों की सतह पे
कुछ इस क़दर नम हैं
कि इक नज़्म में लिखे नहीं जाते।
मुसकुराहटें कुछ यूँ क़ब्ज़ा रखती हैं
लबों रूखसार पर
कुछ दर्द अश्कों में बहाये नहीं जाते।
कुछ रिश्ते प्रीत के.......सिर्फ़ रूह से
होते हैं बावस्ता
कोई नाम नहीं उनके अक्स के
बस एहसासों से महसूस होते हैं
छू के उनके तारूख दिए नहीं जाते
रघुनाथ सिंह राठौड़