जिस मन चालाकी बसे , धूर्त का वह प्रतिरूप
सरल प्रीत बसे जहां , सुंदर लगे , कुरूप
सुंदर लगे ,कुरूप तो समझो , मन है पावन
जेठ महीने में ज्यों बरसे , शीतल सावन
अपनी चालाकी चले ना , रब के आगे
इंसां को इंसां से बांधे , प्रेम के धागे
हुआ सवेरा जब तुम जागो , जब हम जागें
प्रेम नगर से ना तुम भागो , ना हम भागें
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#चालाकी