शाम से मेरी खास मित्रता है, जो दिनभर अपने व्यस्तम कार्यों में रहने के बाद अंतिम समय में साथ होती है। कमरे के भीतर। उसके आने से पहले खुद को पूरी तरह से तैयार कर चुका होता हूॅ। केवल आईना देखना बचा रह जाता है। पांच बजते ही शाम कमरे में आती है। वह अकेली नहीं आती अपने साथ रोशनी के रूप में एक आईना भी साथ लाती है, जिसे कमरे के एक हिस्से में देखा जा सकता है। उस आईने में शाम खुद को पूरा देखने के प्रयास में हमेंशा असफल रहती है। लेकिन मैं उसकी अधुरी छाया में हर रोज खुद को पूरा देख लेता हूं। उस वक्त आईने में कतई अकेला नहीं होता. शाम भी साथ होती है। जैसे यह तस्वीर मेरी अकेली की नहीं, एक शाम भी इसमें शामिल है। जो मेरे जाने के बाद कमरें के अंधेरे में समा चुकी होगी। खैर..