प्रभु भक्ति
एक उद्योगपति हरिनारायण अपने नाम के अनुरूप ही सच्चे मन व समर्पण से ईश्वर की पूजा करते थे। उनका व्यापार भी ठीक ठाक चल रहा था तभी अचानक ही उन्हें व्यापार में बहुत अच्छा मुनाफा होने लगा और इसे वे प्रभु की कृपा ही मानकर उनके मन में एक पहाडी पर एक मंदिर बनाने की इच्छा जागृत हो गई। वह पहाडी उन्ही के मालिकाना हक में थी। उन्होंने इस पर भव्य मंदिर बनवाना प्रारंभ कर दिया।
उस पहाडी पर मंदिर के रास्ते में ही एक गरीब परिवार रहता था। जब मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ तो लोगों ने उसके निर्माण के लिए अपनी ओर से भी सहयोग देना शुरू किया। यह देखकर रास्ते में रहने वाले उस गरीब वृद्ध दंपत्ति के मन में भी इस निर्माण कार्य में सहयोग करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई और उन्होंने मंदिर के निर्माण कार्य में आने जाने वाले श्रमिकों एवं अन्य व्यक्तियों को अपनी ओर से जल एवं गुड़ खिलाने का सेवा कार्य करने लगे। जब उस भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हो गया और मूर्ति स्थापना के विषय में विचार विमर्ष प्रारंभ हुआ तभी एक रात हरिनारायण को स्वप्न में मानों प्रभु का निर्देश मिला कि उस दंपत्ति के यहाँ जो मूर्ति है उसी की स्थापना इस मंदिर में की जाये और तदनुसार उन्होंने उस मूर्ति को प्राप्त कर उसे मंदिर में स्थापित कर दिया। मंदिर के उद्घाटन के लिये जोर-षोर से तैयारियाँ प्रारंभ हो गई थी और प्रख्यात राजनीतिज्ञों से उद्घाटन का प्रारूप तैयार हो रहा था।
इसी समय हरिनारायण की पत्नी को स्वप्न में प्रभु के दर्शन हुए और उन्हें निर्देश मिला कि इस मंदिर का उद्घाटन उस गरीब दंपत्ति के द्वारा ही किया जाए जो कि प्रभु के प्रति पूर्ण मन से समर्पित होकर सेवाभाव रखते हुए मंदिर के निर्माण हेतु कार्यरत हर व्यक्ति को पूर्ण श्रद्धाभाव से गुड खिलाकर पानी पिलाता था। इसके बाद प्रभु इच्छा के अनुसार उसी वृद्ध दंपत्ति से उसका उद्घाटन करवाया गया। उस उद्योगपति का परिवार इस घटना को देखकर प्रभु के प्रति असीम श्रद्धाभाव से भर गया। उन्होने उस वृद्ध दंपत्ति से अनुरोध करके भगवान की सेवा हेतु उस मंदिर का व्यवस्थापक बना दिया। वे वृद्ध दंपत्ति ईश्वर की निस्वार्थ सेवा के कारण सुखी और आनंदमय जीवन व्यतीत करने लगे।