सृजन
प्रसिद्ध कवि रामसजीवन सिंह कवि सम्मेलन में अपना काव्यपाठ प्रस्तुत करने के उपरांत अपने गृहनगर वापिस जा रहे थे। उनके साथ उनके द्वारा लिखी गई नवीन रचनाओं का पूरा संग्रह भी साथ में था। कवि सम्मेलन से लौटते वक्त वे काफी थक गये थे और ट्रेन में गहरी निद्रा में सो रहे थे।
जब उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा कि सामने की सीट के नीचे रखा हुआ उनका संदूक नदारद था। यह देखकर उनके होश उड गये क्योंकि उसमें उनकी नवीन रचनाओं का पूरा संग्रह रखा हुआ था, जो कि उसी सप्ताह प्रकाशन हेतु जाना था। उन्होंने काफी खोजबीन की परंतु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। उन्होने इसकी रिपोर्ट रेल पुलिस में दर्ज करायी। इसके लगभग एक सप्ताह बाद उन्हें पुलिस द्वारा जानकारी मिली कि उनका संदूक रेल्वे ट्रेक के पास अस्तव्यस्त हालत में प्राप्त हुआ है एवं उन्हें जाँच हेतु पुलिस स्टेशन बुलाया गया है।
वहाँ पहुँचने पर उन्होने देखा कि उनकी सभी रचनाएँ संदूक में फटी हुई हालत में पडी हुई थी। यह देखकर वे बहुत द्रवित हो गये। उनको देखकर वहाँ के इंस्पेक्टर ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि महोदय आपका इतना परिश्रम एवं समय व्यर्थ नष्ट हो गया। जिस चोर ने यह सामान चुराया था उसे इसकी कीमत का अनुमान नही होगा परंतु मैं स्वयं एक काव्यप्रेमी हूँ। मैं किसी साहित्यकार की इस वेदना को महसूस कर सकता हूँ। अब आपको इसके सृजन में बहुत परिश्रम लगेगा।
वे कवि महोदय उनकी बात सुनकर बोले की जीवन में व्यक्ति को परिश्रम करने से कभी भी हतोत्साहित नही होना चाहिए और सृजन के प्रति सदैव समर्पित रहना चाहिए। मै तो यह मानता हूँ कि ईश्वर जो भी करता है, उसमें कोई ना कोई भलाई छुपी होती है। मैं जब पुनः इन काव्य रचनाओं का लेखन करूँगा तो विचारों में और भी अधिक परिपक्वता लाकर पहले से भी अच्छे साहित्य का सृजन कर पाऊँगा। हमें समय और परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना चाहिए और अपने कर्म के प्रति समर्पित रहना चाहिए।