जो संकुचित विचार के होते है, वो धर्मनिरपेक्षा को जाणते हुवे भी दुर्लक्षित करे देते है।इसी कारणवश विश्वधर्म जो मानवता का सच्चा रुप है उसे जाण नहीं पाते। यही धर्मांधता मानवकल्याण में बाधक है।
दुसरे धर्म को नीच स्तरपर देखना, कहाँतक सही है।दायरे हमही तय करते है।फिर कैसे विकास हो पायेगा?
#धर्मांध