भरी दोपहर में लहराई जो तुमने अपनी जुल्फ़ों को
घटा छाई हो सावन की सभी को ऐसा लगता है
हटाया जुल्फ चेहरे से बेखबर होके जो तुमने
घटा से चांद निकला हो सभी को ऐसा लगता है
कशमकश में हैं सब पंछी नीड़ से जाऊं या लौटूं
ज़माना भी है दीवाना तुम्हारी इन अदाओं पर
दीवानों को कहां अब होश दिन है या की है रात
ज़माना तुमसे है ज़ानम तुम ज़माने से नहीं हो
#बेहोश