पुरुषार्थ चतुष्टय में सक्षम
सर्वोपकारिणी, जन्मदायिनी, ममतामयी
सर्वस्व प्रेम में हार गयी
मातृ-स्नेह से पगी हुई
गुरु के उपदेश से जगी हुई
माता-पिता की छाया से
और भाई-बहन की माया से
वंचित होकर
ले आर्द्र नयन
करुणा की मूर्ति बालिका
जब अपरिचित घर-द्वार गयी
सर्वस्व प्रेम में हार गयी
पति-गृह को अपना मान लिया
स्वपीड़ा का न संज्ञान दिया
संधार्य कष्टों की घटा घनी
सहिष्णुता भी संत्रास बनी
निर्वाह माँ के संस्कारों का
और दान-दक्षिणा पितृ-पक्ष की
आज सभी निःसार गयी
सर्वस्व प्रेम में हार गयी
पिता-पति दोनों के घर हैं
एक सरल हृदया वंचित है
सृष्टा की रचना के हृदय में
मातृत्व का अक्षतागार संचित है
मृत्यु को कर दे पराभूत
तब वात्सल्य शक्ति आकूत
देती नारी को धार नयी
सर्वस्व प्रेम में हार गयी
पुरुषार्थ चतुष्टय में सक्षम
सर्वोपकारिणी, जन्मदायिनी, ममतामयी
सर्वस्व प्रेम में हार गयी
डॉ. कविता त्यागी