मृत सी पड़ी आशा कहीं ,
साँसो की पकड़े डोर है |
जोहती है बाट, मुँख मे ,
मेरे कोई डाल दे,
बूँद अमृत की कोई ,
एक बूँद अमृत की कहीं से|
अचानक ! किसी ने जोर से,
झकझोर कर मुझसे (आशा) कहा ,
उठ! पड़ी क्या सोचती!
मृत अभी तू है नहीं|
प्राण अन्तर मे है तेरे,
ढूंढ जो बाहर रही |
देख तेरे पास हूँ मै 'हौसला',
अब साथ हूँ |
#मृत