चिंतन
मेरे मन के उजास में
थोड़ा धुंधलापन आया
ऐसा कुछ लगा जैसे
एक कोने में अंधेरा छाया।
क्या कुछ पल को
किसी चिंता ने तुम्हे डसा
जिसके भारी दंश से
मेरे मन का उजास घटा।
हाँ, एक कोना मेरे मन का
जिसमें तुम्हे संजो कर रखती
दमकता है दहकता है
तुम्हारी खुशी और गम से ही।
तुम कहोगे नही कभी
इतना तो यकीं है मुझे
ये अनकहे अहसास मगर
जीने भी देते नही मुझे।
कह दो जो शूल मन मे हो
मेरे उजास से कालापन दूर हो
नही भाती कालेपन की परछाई
नूरे-उजास से फिजाओं को रंगने दो।
एक नूर बरसता है
तुम्हारे कहकहों से हर पल
उस नूर में जम कर
मुझे नहा लेने दो हर क्षण।
हर पल जिंदगी कम हो रही है
एक पल को सौ बार मुझे जीना है
मानव जन्म मिला मुश्किल से
अंधेरों में इसे कदापि नही खोना है।
विनय...दिल से बस यूँ ही