थक के शाम के पहलू में,
बैठ गयी जिन्दगी,
एक रस्म अदायगी,
बन के रह गयी जिन्दगी.....
ना कहीं मुकाम मिला
ना कहीं पूर्णता,
जंगल हैं इच्छाओं का,
भटक के रह गयी जिन्दगी.....
एक डाली पर था,
रैन बसेरा,
आँधीयों की भेंट,
चढ़ गया संसार....
तिनका-तिनका,
बिखर गयी यें जिन्दगी.....
टुकड़े चुनती हूँ,
टूटे हुए दिल के,
हर एक टुकड़ा,
सौ सौ बार टूट गया,
चुनौती बन गया,
जीना यें जिन्दगी.....
एक दिन कभी,
यूँ ही सफर खत्म,
हो जाएंगा,
दर दर भटकती जिन्दगी को,
ठहराव मिल जाएंगा......
गुमनाम सी गलियों में,
गुम हो जाएंगा कारवां,
शायद फिर,
सुकून पा जाएंगी.....यें जिन्दगी.....!!!
✍✍वर्षा अग्रवाल द्वारा रचित🙏🙏🙏