चलना , रुकना, विश्राम करना और दमभर कर पुनः खड़ा हो जाना,और पुनः यात्रा पर चलना, ये जीवन का अभिन्न अंग है, इससे हम भाग नहीं सकते किन्तु इस अंग का उपयोग अपने जीवन में हम कैसे करते है कैसे काम में लाते है ये हमारे पर निर्भर है हारने वाले भी जीवन में रुकते है और जितने वाले भी जीवन में रुकते है ...हारने वाले रुकते है थक के और जितने वाले रुकते है केवल उस स्तर पर पहोच कर,अब रुकना तो हमे है ही लेकिन कैसे रुकना है थक के या किसी स्तर पर पहोच के ये निर्णय हमे खुद लेना है रुकिए भले ही लेकिन थकेगे नहीं क्युकी हमे पुनः उठना है और पुनः यात्रा पर चलना है... उच्च स्तर पर पहोचना है....