माना है तू बड़ा काबिल,
अपनी मुश्किलें हल करने में ,
गैरों से मिले ज़ख्मों को, धीरे-धीरे भरने में,
या खुद को खुद ही तोड़ के, फिर से खुद को जोड़ने में,
पर कभी गर तू टूट जाए, तो सच सारा बोल देना,
जहरीले राज़ जो भी दफन हैं, सामने सब खोल देना,
और ये खयाल तो लाना ही ना, कि मैं या लोग क्या सोचेंगे,
तू पागल है, कमजोर है, बोलकर तुझे दबोचेंगे,
यहाँ हर चेहरे की खुशी के पीछे, छिपे थोड़े से गम हैं,
अंतर बस इतना है, किसी के ज्यादा तो किसी के कम हैं,
अपने हैं जो तेरे, वो सामने हर दम आएंगे,
सहारा नहीं, अपनी मौजूदगी से, आत्मबल तेरा बड़ाएंगे,
तो साथ ढूँढ, और बोल दे,
मन का बवंडर छोड़ दे,
आत्मनिर्भर बनने की जिद में,
कहीं तू अपनी आत्मा ही न तोड़ दे,
बस ऐसा कभी न करना ...