कभी कभी लगता है
जैसे कि -
मैं किसी लायक़ नहीं
सारे हुनर मेरे
खो गए हैं कहीं
सारी कलाकारी में
धूल जम गई है
तालियां सारी बेमानी
सी लगती हैं
शाबाशियां सारी खोखली
सी लगती हैं
उस समय मन करता है
मैं बच्चा अबोध सा
हो जाऊं फ़िर से और
भूल जाऊं सारा सीखा
और गढूं खुद को
एक नए सिरे से
तालियों, शाबाशियों की
मोहताज सारी कलाएं
खो जाएं उनके ही शोर में कहीं
और
बस मन के आनंद के लिए
जन मन के आनंद के लिए
सारा सृजन हो
सारी लगन हो
सारी अगन हो
मन मगन हो
:- भुवन पांडे
#लायक़