चाट पकौड़ी का ठेला लगता था
लॉकडॉउन में धंधा उजड़ गया,
हारकर बैठना उसे मंजूर न था
नए- नए उद्योगों का वो सोचता
पुराने ठेले पे आमों को सजा के
' लंगड़ा, दशहरी और हापुस आम,
लेलो रसीले मीठे आम'
की आवाज़ दे गली-गली वो जाता था
आम बेचकर घर का चूल्हा वो रोज़ अब जलाता
एक दिन ऐसे मोहल्ले में आ पहुँचा
जहां उच्चे घर और खोखले जहान थे
कहने को अमीर थे पर सब परेशान थे
बेचारे के कुछ आम खराब निकले
लोग उसपे भड़क उठे
कुछ गलियाते कुछ आम फकेने लगे
' भाई सहाब १०० ₹ किलो है! क्या कर रहे हो'
रुआहसी आवाज़ में वो कहता रहा
पर उसकी सुनने वाला कौन था,
पैसों का रोब झुकने वाला कहा था
लाख मिन्नते कर , ठेला ले वो भगा,
रास्ते भर अपने राम को कोसता रहा
' गरीबों की मदद करते हो, कहां थे तुम ' यह पुछता रहा
गली किनारे सड़क पे बैठ
चूल्हा कैसे जलेगा यह नम आँखों से सोचता रहा
एक गाड़ी का पहिया थमा
सूट पहने उसका मालिक खड़ा
एक-एक कर वो आमो को जाचता
कभी हाथ में ले देखता, तो कभी सूंघता
एकाएक बोल उठा
सारे आम पैक कर दो जरा
मज़दुरो में बाटने है यहां
मुस्कान उसके होटों पे तर गई
अपने राम की माया समझ ली।