हद होती है भोले पन की |
हद होती है ना समझी की ||
सलामत रहोगे अगर दुनिया की दस्तूर को समझ जाओगे
कुछ चालाकी सिख़लो नहीं तो घास की भांति पैरों तले
कुचल दिए जाओगे |||
कदम कदम पर धोका, फरेब, जालसाज़ी का चक्रब्यूह
अभिमन्यु की तरह फस के रह जाओगे ||||
तुम जितना भरोसा रखोगे, उतना आघात पाओगे
वक़्त रहते सीखजाओ दुनिया दारी को
छल कपट का मुखौटा पहने घूम रहे हैं लोग
तुम जैसे भोले भालों को लूटने को.