मैं उसे अपनी स्मृति से निकाल देना चाहती हूँ।
इसलिए नहीं कि प्रेम नहीं है मुझे, बल्कि इसलिए क्योंकि प्रेम असीमित है। जब किसी वस्तु, इच्छा, अथवा भावना की अधिकता हो जाए तो वो कष्टकारी बन जाती है। ऐसे ही प्रेम सीमा से बाहर होने पर केवल हृदय को कष्ट देता है।
मेरा ये असीमित प्रेम ठीक वैसा ही है जैसे यदि आप घाव के भरने पर और खून के जमने पर, वापस उस घाव पर चढ़ी हुई नई नरम चमड़ी को खींच दें।
ऐसे ही मेरा प्रेम उसे स्मृतियों से खींचकर पुनः पाना चाहता है। मैं उसे केवल अपने मन से ही नहीं बल्कि रोम रोम से निकाल देना चाहती हूँ।
ये ठीक वैसा ही है..
जैसे मैं समुंदर से जल निकालने की बात करुं,
मैं आसमान से सितारे निकालने की बात करुं,
मैं रेत से कण निकालने की बात करुं,
मैं शरीर से रूह निकालने की बात करूं,
वैसे ही मैं स्वयं से उसे निकालना चाहती हूँ।।
मैं असम्भव को सम्भव करना चाहती हूँ💔
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