आत्मचिंतन__
मानव एक सामाजिक प्राणी है और समाज मे रहकर वो कभी पूर्ण संतुष्ट नहीं हो सकता, उसकी महत्वाकांक्षाओं का कोई पार नहीं है और मानव जब तक ये समझ पाता हैं कि स्वयं का जीवन किस प्रकार जीना हैं तो तब तक आधी से ज्यादा उम्र बीत जाती है।।
एक अच्छा जीवन जीने के लिए हमें अनुभवों की आवश्यकता होतीं हैं और ये अनुभव मानव,समाज या आस पास के वातावरण से प्राप्त करता हैं, कहा जाए तो जीवन की बहुत सी असफलताओं और सफलताओं से भी हम अनुभव प्राप्त करते हैं और अनुभव का सबसे बड़ा माध्यम होती हैं पुस्तकें।।
और हमनें अपने जीवन में अगर बीस पुस्तकें भी पढ़ ली तो हमें अलग अलग बीस व्यक्तियों के अनुभव प्राप्त हो जाएंगे जो शायद हमारे जीवन मे हमें कोई ना कोई लाभ ही पहुँचाएंगे, जब आपके पास बहुत से अनुभव होगें तो आप एक सरल और सुलझा हुआ जीवन जी सकेंगे।।
जब आप अपने जीवन के अंतिम पडा़व तक पहुंचते हैं तब आप सोचते हैं कि आखिर जिन्दगी मे आपने अभी तक क्या जुटा पाया, धन,ख्याति या अनुभव और उन सबमे आपको सबसे ऊपर अनुभव ही दिखाई देगा,उस समय मानव केवल यही सोच पाता है कि जीवन भर जिन निरर्थक चींजो के पीछे भागता रहा, क्या वो वस्तुएं उसके मन को जरा सी भी सुकून दे पाईं, लेकिन नही उसने कभी वो चीजें चुनने की कोशिश ही नहीं की जो उसे सुकून दे पाती,वो तो बस दुनिया के साथ भेड़चाल मे भागता रहा,कभी उसने ठहर कर ये सोचा ही नहीं कि जिस चीज के पीछे वो भाग रहा वो उसके लिए आवश्यक हैं भी या नहीं।।
वो तो इस भागदौड़ में अपने शौक तक भूल जाता है, क्योंकि वो ठहरता ही नहीं, क्योंकि वो स्वयं नहीं ठहरना चाहता, जब आप स्वयं विचार नही करेगें कि आपके लिए क्या जरूरी हैं तब तक आपको आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकतीं, आनन्द की प्राप्ति के लिए आत्मचिंतन करना बहुत आवश्यक हैं।।
इति_
सरोज वर्मा__