पायल
******
मेरे पाँव की पायल भी
बेबस और मजबूर हो गयी
मुस्कुराने की चाहत थी
मगर उदास हो गयी।
तुम्हारे इंतज़ार में यह
इस जहां से बेजार हो गयी है
खनकती इसकी सदा भी
दर्द के साज में बदल गई है।
मचलती है बेपरवाह सी
मगर एक आह भी संग आती है
आज पैरों में आई तो मगर
तुम्हारी ताल को तरस गयी है।
बजना चाहती है छुन छुन
खामोश मगर रह जाती है
बदले जमाने की नारी की
चाल से सुरताल न मिला पाती है
बदल गया यह जमाना और
बदली नारी की चाहत भी है
पायल की जगह अब देखो
काले से धागे ने ले ली है।
मन ही मन बड़ी खार खाती है
काले धागे को बद्दुआ से नवाजती है
पी का प्रेम जो पायल वाली को मिले
काले धागे वाली उस प्रेम को तरसती है।
विनय...दिल से बस यूँ ही