मौत की आमद
भारत बंदी की बंदिश भी
रोक नहीं पाई मौत की आमद
जठराग्नि की लपटों में
सोलह घर
हो गए स्वाहा
सरकार , भाइयों व बहनों तक
सीमित न थी फिर भी
रोक न पाई मजदूरों की भूख
भूख में पलायन
पलायन में
भूख के बाद की थकी मांदी नींद
नींद में चमकती सुनहरी रोटियां
टिफिन में बंद ताजी चटपटी चटनी की चटक
परिवार का प्रेम
बच्चों की किलकारियां
सपनों का सपनों में आलिंगन
आमजन के लिए बंद रेलवे भी
दे न पाई आहट
रोक नहीं पाई
मजदूरों के मौत की आमद
मौत की आमद
खोल नहीं पाई
फैक्ट्रियों के ताले
नौकरी - व्यापार के द्वार
शहर से गांव की ओर
बढ़ते कदमों का जोर
सड़कों -पगडंडियों पर
भटकती- भागती भीड़ अपार
मुरझाए चेहरे
भूख प्यास से मजबूर
फटे होंठ लिए कलपते बच्चे और औरतें
क्या देखूं ?
मजदूर के पैरों के फफोले
या देखूं
रेल की पटरी पर सोई भरी पूरी देह का
लुगदी हो जाना
अपनों से मिलन की यात्रा
सपनों में सिमट गई अंतिम यात्रा |
-शिव सागर शाह