समर्पण मन की एक ऐसी स्थिति का नाम है।
जब मनुष्य अपने सारे संकल्पों का त्याग कर देता है, स्वयं से किसी भी प्रकार का निर्णय अथवा प्रण भी नहीं लेता है, जिस प्रकार के कार्य उसे दिए जाते हैं, उसी प्रकार के कार्य वो करता है।
वास्तव में समर्पण का अर्थ होता है अपने आपको ,अपने मन को,बुद्धि को,ज्ञान को,इच्छा को,आशा को,अपनी भावनाओं को अपना सब कुछ किसी को अर्पण कर देना और ऐसे समर्पण को भक्ति कहते हैं।
मनुष्य जिसके प्रति समर्पित होता है उसी के रूप में ढलने लगता है, उसके मन में कोई संदेह कोई प्रश्न जन्म नहीं लेता है।
किसी दुष्ट के प्रति समर्पण उस मनुष्य के कार्यों को भी दूषित कर देता है, इसलिए समर्पण किसी उत्तम के प्रति होना आवश्यक है उसी से मनुष्य उत्तम बनता है।