खड़ी हूं दर्पण के समक्ष
पर नहीं पहचान पाती खुद को,
दिखती हैं अनगिनत लकीरें
उम्र की जो वक़्त ने दिए हैं,
पीली आंसुओं से धुँधली आँखे
जिनमें दिखते हैं बिखरे सपने
टूटी ख्वाहिशों के अक्स,
उड़े बिखरे बाल,कांतिहीन चेहरा,
खुरदुरे हाथ जो कह रहे हैं
तमाम कहानियां असफलताओं की,
तमाम कोशिशों के बाद भी
नहीं खोज पाती पुरानी पहचान
पाती हूँ खुद को नितांत अजनबी।
#चेहरा