घर से हम इस आस में निकले थे की किस्मत तुम संवार ही दोगे।
ज़माना बैरी है तो रहे ऐ दोस्त मुझे हमदम बनाकर बहार ही दोगे।।
मुझ बेज़ान सी अनगढ़ मूरत को सजीव परी सा आकार ही दोगे।
जो देखे थे रंगीन सपने ऐ सनम अपने पारस हाथों से साकार कर ही दोगे।।
मगर मुझे क्या मालूम लुभाने की कला में थे माहिर और दिल था रूखा।
बिन सोचे बिन समझे जीवन हुआ मरुथल जो रहे सदा ही सूखा - सूखा।।
#सूखा