कोरोना: कितना हास्यकर ...
कितना हास्यकर है कि
आज़ आदमी कैद है
अपने गृह पिजरों के भीतर
और पशु पक्षी आज़ाद हैं
आकाश में, जंगल में
आज़ आदमी आदमी से
अलग थलग हो गया है
जुड़ने के लिए विश्वव्यापी जंग में
कोरोना विषाणु के खिलाफ़
आज़ हवाएं साफ हैं
पर हर इंसान मुंह पर मास्क लगाए
अपनी श्वास रोके
निकलता है बाहर
आज़ आसमान नीला है
चमकदार सूरज है
पर इंसान का रंग फीका है
और चेहरा डरा बुझा बुझा सा है
आज़ वो ही आदमी
जो नाप आया था मंगल, चन्द्र
भयभीत हो घर में दुबका है
एक अदृश्य विषाणु से
आज़ ये यमुना गंगा
साफ स्वच्छ हो गई हैं
जब आदमी कुछ नहीं कर रहा
बस मुंह ढके घर पर बैठा रहा
आज़ वाचाल चंचल मानव
चुपचाप बैठा है और
निर्जीव सा सूक्ष्म विषाणु
विनाश लीला नर्तन कर रहा है
:- भुवन पांडे
#हास्यकर