सुदंर रचना ...
कमाने के लिए रोटी नही ,यहां तो ईमान बिकता है ।
जरा सी भुख के खातिर ,यहां अभिमान बिकता है ।
सरे बाजार बिक जाती ,यहां अस्मत मेरे यारो ।
लिए इस पेट के अब तो यहां सम्मान बिकता है ।
सफल जीवन बनाना है ,जरा उपकार करते चलो ।
अगर सम्मान पाना है तो ,मृदुल व्यवहार करते चलो ।
मिटाकर नफरते दिल की सारी ,सभी से प्यार करते चलो ।
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