ना पेड़ दीख रहे है
ना कोई छाँव है
सचमे...ये धुप बहुत तेज़ है।
उपर आग ज़रता आसमान
नीचे तपती ये रेत
अरे...ये धुप बहुत तेज़ है।
ना एक बुँद पानी है
उपर से न बुजती ये प्यास है
उफ्फ...ये धुप बहुत तेज़ है।
बैसाख़ी ऋत की ये
गरम सुखी हवाँए है
करे भी क्याँ...ये धुप बहुत तेज़ है।
अंबर आग उगलता है
धरती अंग जलाती है
अरे...ये धुप बहुत तेज़ है।
- YashKrupa
- Shital Goswami (Krupali)