विश्व का अस्तित्व इतना ही जितना की हम अपनी इन दो आँखो से देख पाते है, यहाँ की प्रकृतिक व भौगोलिक अवस्था ,वैज्ञानिक संसाधनो के योगदान से हम अब विश्व की समस्याओ से भी जुड़ गये है ,इतना ही नही समान्यतः उनसे निपटने का प्रयास भी मिलकर करते है. विज्ञान ने हमेरे बीच निकटता ला दी है.किन्तु इन सबसे अलग आज जो विचार का विषय है विश्व ? क्या विश्व की परिभाषा और पहचान इतनी ही? हम जो परिभाषा देते हैं ,उसमे सूर्य ,चन्द्रमा ,तारे ,उलकापिण्ड ,ग्रह , आकाश गंगा जितनी भी जीचे हमे दिखती जाती हैं,हम उसे संसार की परिभाषा मे शामिल कर लेते हैं . किन्तु कभी इस पर भी विचार किया गया है कि इसका कोई नियंता भी है.क्या वह विश्व से अलग है,था नही मान सकते क्योकि ये वर्तमान अवस्था मे भी परिचायक हैं. हम उसे प्रमाणिक रूप मे क्यो नही मानते , हमने ,रोशनी ,वायु गंध सबको वैज्ञानिक आधार पर उसके अस्तित्व को स्वीकार किया है, किन्तु हमे उसके नियन्ता से परहेज है . क्या हवा, सूर्य ,जलवायु विज्ञान ने बनाये हैं ,और यदि जवाब नही मे आता है तो हम उस नियन्ता के अस्तित्व को स्वीकार क्यो नही करते. शायद ऐसा इसलिए है , कि उसकी प्रमाणिकता विज्ञान के अस्तित्व पर खतरा है . अपने इसी( विज्ञान) के मद मे एक विनाश की राह थाम ली . अगर विज्ञान प्रमाणिकता पर कार्य कर हर समस्या का हल तलासने मे सक्षम है ,तो आज पूरा विश्व समस्या से बचने के लिए घरों मे कैद क्यों हो रहा है. कहाँ गया ये विज्ञान? चलिए मान लेते है कि इसका भी निदान एक दिन निकल ही आयेगा ,किन्तु हम सिर्फ इसका इलाज ही ढूंढ सकते है .इस समस्या का निर्माण कैसे हम जान पायेंगे?चलो मानते है यह भी जान लिया जायेगा ,क्या इसके बाद अब कोई समस्या न आयेगी, और यदि यह समस्या आ रही है तो इसका निर्माण कर्ता कौन है, क्यों है, कैसे है, विज्ञान केवल तलाश मात्र है . यह समस्यायें ही उसके(विज्ञान)अस्तित्व की पोल खोल रही हैं. हमारी आँखे वायु के अस्तित्व को अस्वीकार कर रही है पर नासिका उसे प्रमाणित कर रही है . इसी प्रकार बहुत सारे उदहारण है. सिर्फ यह बताने के लिए कि हम माने न माने पर उस परासत्ता के अस्तित्व को हम नकार नही सकते.और यह भी सत्य है कि बिना उसको माने हम एक चेतनाविहीन अंधयुग मे दिशाहीन होकर चल रहे है जो धीरे -धीरे मानवता को खत्म कर देगी . इसका आगज हो चुका है. विश्व को बचाना है तो आधार बदलना ही पड़ेगा.
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