My Sorrowful Poem..!!!
यारों लगता हैं आज यह
जिंदगी भी तो कुछ खफा हैं
चलिए छोड़िए हादसा भी
यह कोन सी पहली दफा है
बुरे वक़्त की दहलीज़
पर आदमी आज ग़मज़दा है
उन्नतियों के रास्ते सभी बंध
ओर हर आदमी ख़ौफ़ज़दा हैं
धड़कने भी तो गिनती की है
पर हर धड़कन पे आज पहरा है
उम्मीद की किरण गर खेर करे
तो कल का सूरज ज़रूर सुनहरा है
कितने बचे कितने गए ज़ालिम
यह गिनती का रुप घिनौना-सा है
गुजरते गुजरते ज़रूर गूजर ही
जाएँगा यह पल भी, जो गेहरा हैं
रह जाएगा तो बस यादों का
एक जज़ीरा जो आज ज़हर-सा है
प्रभु ही जानते है कब कहाँ कैसे
ख़त्म होगा सफ़र वक़्त का जो ठहरा है
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