भक्ति की क्या हद है कोई नही बता सकता। भक्त को पत्थर मे भगवान और भगवान मे पत्थर दिखता है। एक ऐसी ही घटना मुझे याद आती है, जिसको मै बाँटना चाहता हू।
एक मित्र थे मेरे बड़े करीबी, उनकी कहानी है, कई साल पहले की बात है, हम दोनो साथ मे पढ़ते थे। एक छोटे शहर मे हम दोनो एक ही बिद्यालय मे थे, वो भी पंडित था और पंडितायी मे अब्बल। वेद शास्त्र सब कंठस्त था उसके। हम दोनो बैठे कर अक्सर ही अध्यात्म की बाते करते रहते थे जब भी खाली वक़्त मिलता।
एक दिन बैठे बाते चल रही थी और हम इतने रम गए थे कि पता ही नही चला कब घंटो बीत गए। शाम के करीब सात बज गए होंगे, मेरे मित्र ने बोला मित्र संध्या आरती का वक़्त हो गया है, संयोग अच्छा है आज तुम भी साथ हो, चलो चलकर आरती करते है। मैने बोला भाई यहाँ तो कोई मंदिर नही है, मंदिर दूर है और हमे जाते जाते काफी वक़्त लगेगा और जबतक आरती का वक़्त भी खतम हों जाएगा।
उसने बोला दूर कहा है यहीं है पास मे। मुझे विश्वास नही हुआ क्यों कि मुझे वहाँ रहते कई वर्ष हो गए थे और ये पता था वहाँ आसपास कोई मंदिर नही था। बार बार मना करने पर भी मेरा मित्र नही माना, फिर मुझे उसके साथ जाना ही पड़ा। पांच मिनट चलने पर ढलान के नीचे ही एक खँडहर जैसा मंदिरनुमा कुछ दिखा, वो वही रुक गया।
मैने कौतूहल से पूछा क्या यही है वो मंदिर।
उसने जबाब मे हाँ कहा। इसी मंदिर मे मै रोज आता हूं। शिव जी का मंदिर है। बहुत प्राचीन है और कुछ लोगो को ही पता है। उस खंडहर को देख कर मेरे मे संसय के तूफान उठने लगा।उसकी बनावट देख के मंदिर कम भूत बंगला ज्यादा जान पड़ता था। अंदर से अंधेरा और बाहर एक दो पेड़ थे जिसपर से बंदरों की लड़ने की आवाज आ रही थी। निश्चित ही वो बंदरों का महान अड्डा था। वहाँ कोई दूर दूर तक आता जाता नही दिख रहा था मुझे। मैंने बोला भाई मुझे यहाँ कुछ उचित नही लग रहा है, शायद तुम्हे भ्रम हो गया है, यो कोई मंदिर नही भूतों का अड्डा है। हमें जल्दी यहाँ से निकल जाना चाहिए।