पहेली
दिमाग मेरा, तो कहता है, वो है नही तेरा;
पर क्यूं उम्मिद नही छोड़ता है यह दिल मेरा???
प्यार तो नही मिला, बस उसने मुझे उल्ज़ाया और भरमाया
थक गयी हु यह कश्मकश से; पता ही नहीं की तू अपना है या पराया ;
अब तो दुख, दर्द, पीडा बन गई है मेरि सहेली
कोई तो बतलाये; कोई तो सुल्ज़ाए यह पहेली ।
Armin Dutia Motashaw