मैं जानती थी #कृष्ण ,
जो तुम गए तो #होली खेलने भी
वापस #वृन्दावन नहीं लौटोगे.
नम आँखों से जुटे रहोगे,
पूर्ण करने अपने कर्त्तव्य.
कभी इन्द्रप्रस्थ -कभी द्वारिका.
इसीलिए मैंने,
वृन्दावन में तुम्हारी अंतिम होली के
रंग कभी धोए ही नहीं.
न तन के, न मन के .
मैं आज भी हूँ ,
वैसी ही ,
पीताम्बरी,
श्यामल,
और गुलाबी.
मैं जानती हूँ,
महाभारत के पार,
तुम भी वैसे ही हो,
रस -रंग बरसाते,
नम आँखों में
भुवन मोहिनी मुस्कान से
सबको छलते.
#शुभ _होली